लघुकथा: न्याय हो तो ऐसा

लंका पर विजय प्राप्त प्रभु श्री राम माता सीता और अपनी सेना सहित रथ पर सवार होकर एक वन से जा रहे थे। अचानक एक पत्थर उनके सिर पर आकर लगा, उनकी सेना का काफिला रुक गया और पत्थर मारने वाले की तलाश करने लगा। थोड़ी देर में सैनिक एक बुढ़िया को पकड़ लाए, जो भय से थरथर कांप रही थी। सैनिकों ने कहा, "महाराज इस बुढ़िया ने आपको पत्थर मारा है, प्रभु श्री राम ने बुढ़िया को पास बुलाकर कारण पूछा तो वह बोली, "महाराज मेरे बच्चे दो दिन से भूखे हैं, अनाज का एक दाना भी घर में नहीं है, जब कोई उपाय न सूझा तो भोजन की तलाश में घर से निकल पड़ी। सामने के पेड़ पर फल देखकर मैं पत्थर मारकर इन्हें तोड़ने की कोशिश कर रही थी, ताकि बच्चों के पेट की ज्वाला शांत कर सकूं। दुर्भाग्य ने यहां भी मेरा साथ नहीं छोड़ा और पत्थर आपको लग गया। मैं माफी चाहती हूं।" प्रभु श्री राम जी ने सेनापति को आदेश दिया, "इसे कुछ अशर्फियां देकर छोड़ दो।" सेनापति ने आश्चर्य से पूछा, “महाराज यह कैसा ईनाम, यह तो सजा की हकदार है।" प्रभु श्री राम जी ने हंसकर उत्तर दिया."जब पत्थर मारने पर निर्जीव पेड़ भी मीठा फल देता है तो मैं बुढ़िया को निराश क्यों करूं।" बुढ़िया प्रभु श्री राम जी के सामने नतमस्तक हो गई। प्रभु श्री राम जी की न्यायप्रियता इतिहास में अमर है। ऐसे ही नहीं प्रभु श्री राम जी को मर्यादा पुर्शोतम कहा जाता।




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