आमतौर पर लोग चर्चा में कहते हैं कि हम किसे गुरु बनाएं वे दूसरों की देखा देखी सुनी सुनाई बात पर ऐसा कह देते हैं या ये भी हो सकता है कि उनके अंदर उठे इस प्रश्न का भविष्य में कोई समाधान होने वाला हो। गुरु शिष्य परम्परा की सबसे मुख्य बात ये है कि शिष्य कभी गुरु नहीं चुनता, गुरु ही शिष्य को चुनता है। जिसे वह दीक्षित कर साधक बनाना चाहता है। सोच कर देखिये क्या एक साधारण मनुष्य की इतनी क्षमता हो सकती है कि वह गुरु का चयन कर सके?
पूर्व जन्म के कर्मानुसार गुरु की आंतरिक प्रेरणा से भक्त स्वयं चलकर गुरु के पास पहुँचता है। गुरु को पूर्व से ही ज्ञात होता है कि इस शिष्य से उसका क्या संयोग है। शिष्य और गुरु के मिलन की घटना साधारण सी लग सकती है परन्तु उस समय गुरु शिष्य को गुरुमन्त्र के माध्यम से सूक्ष्म रूप से शिष्य के आंतरिक रूप में प्रवेश कर लेता है तथा शिष्य की सुप्त अवस्था में पड़ी कुंडलिनी को छेड़ कर बाहर आ जाता है। उस समय गुरु अपना कार्य कर देता है शेष कार्य शिष्य का रह जाता है तथा वह शिष्य से एक साधक के स्वरूप में परिवर्तित होने लगता है। गुरु के बताये मार्ग पर ज़ब साधक अपनी साधना को पक्का करने हेतु चलना शुरू करता है तब उसको जीवन में कठोर समस्याएं एंव विचलित कर देने वाले हालातों का सामना करना पड़ता है। साधक के जीवन में ये वही परीक्षा होती है, जिससे साधक के जन्म जन्मातर के पापों का नष्ट होना शुरू हो जाते है, जिसमें मृत्यु तुल्य अनुभव, घोर अपमान, असफलता, सगे संबंधियों से दूरी जैसे हालात बनते हैं। उस समय साधक को निष्ठा पूर्वक, हठ पूर्वक अपने कार्य में लगे रहना चाहिए क्योंकि इन हालातों से गुजर कर ही साधक को अध्यात्म और परमात्मा का ज्ञान होता है। गुरु के प्रति गहरी निष्ठा ही इन सभी का सामना करने में अति सहायक होती है। साधक ज़ब इन चीजों को समझने और जानने लगता है तब वह पूर्ण रूप से शुद्ध हो सम्पूर्ण साधना का अधिकारी होकर गुरु के माध्यम से इस धरती पर सफल जीवन व्यतीत कर मोक्ष को प्राप्त होता है।

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