जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है मंत्रों का प्रयोग ब्रह्माण्ड की विशाल ऊर्जा से स्वयं को एकाकार करने के लिए किया जाता है। शास्त्रों में मंत्र की कई परिभाषा दी गयी हैं जैसे
"मननं विश्वविज्ञानं त्राणं संसारबन्धनात्।
यतः करोति संसिद्धो मंत्र इत्युच्यते ततः।।"
अर्थात, जिस के माध्यम से दिव्य एवं तेजस्वी देवता के रूप का चिंतन और समस्त दुखों से रक्षा मिले, वही मंत्र है।
मंत्र अक्षर व नाद(ध्वनि) का वो सम्मिलित स्वरूप है जिसकी ऊर्जा, प्रभाव व महत्व कभी समाप्त नही होता, जिस तरह नाद अर्थात ध्वनि अमिट है उसी प्रकार अक्षरों से निर्मित ये मंत्र सत्ता भी अमिट है।
अ एवं क्षर
अर्थात जिसका क्षरण न हो पाए वही "अक्षर" है।
नाद और शब्द(अक्षरों के समूह) से निर्मित ये मंत्र मूल ध्वनि के उचित उच्चारण से शब्दों को ध्वनि तरंगों से जोड़कर उनमे ऊर्जा का संचार कर देते हैं जिससे एक सर्किट तैयार हो जाता है आपके शरीर और ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के मध्य में, और कितनी ऊर्जा को आप सम्हाल पाएंगे वो आपके योग और प्रणायाम से सधे हुए शरीर पर निर्भर करता है। मुझे हमेशा लगता है कि ईश्वर ने सारी शक्ति का समावेश इस शरीर मे पहले से ही किया है, बस इसको कीलित कर दिया है ताकि व्यक्ति इसका उपयोग अपनी मानसिक क्षमता के अनुसार कर सके ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के साथ स्वयं को जोड़कर हम शायद शरीर की इसी शक्ति को unlock करके बहुत सूक्ष्म मात्रा में जागृत कर लेते हैं, इसलिए अक्सर ध्यान(meditation), जप/पूजा इत्यादि के बाद हम खुद में नए विश्वास और ऊर्जा का संचार महसूस करते हैं।

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