हज़ारों वर्ष पहले हमारे ऋषि-मुनियों ने मनुष्यों को तन, मन और आत्मा से स्वस्थ रखने के उद्देश्य से योग का आविष्कार किया था। महर्षि पतंजलि ने मनुष्य के सम्पूर्ण विकास के लिए योग के आठ अंगों का क्रमशः पालन करने का निर्देश दिया है। इन्हें हम अष्टांग योग के नाम से जानते हैं। ये इस प्रकार हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ।
यम
वास्तव में आत्मसंयम की विधा है। आत्म संयम के लिए इन पाँच महाव्रतों का पालन आवश्यक माना गया है :-
- अहिंसा- किसी भी जीवधारी की हत्या न करना और किसी को कष्ट न पहुँचाना।
- सत्य- सदा सत्य बोलना और सही आचरण करना।
- अस्तेय- किसी भी तरह की चोरी नहीं करना, दूसरे के अधिकार को न छीनना, कामचोरी नहीं करना और कर्तव्य पालन से जी न चुराना।
- ब्रह्मचर्य- मन, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों पर नियंत्रण करना ।
- अपरिग्रह- आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना ।
नियम
अर्थात् आत्मशुद्धि करना। इसके भी पाँच अंग हैं :-
- शौच- बाहरी और आंतरिक शुद्धि ।
- संतोष- जो है, उसमें संतोष करना ।
- तप व्रत- उपवास आदि के सतत् प्रयास।
- स्वाध्याय-अच्छी पुस्तकों एवं धर्मशास्त्रों का पठन-पाठन और अध्ययन ।
- ईश्वर प्रणिधान- ईश्वर की भक्ति करना और अपने आपको ईश्वर को समर्पित करना।
आसन
इसके अन्तर्गत विभिन्न जोड़ों के माध्यम से शरीर की विभिन्न मुद्राएँ बनाना। इससे जोड़ों, माँसपेशियों तथा शरीर के विभिन्न अंगों की शक्ति, गतिशीलता और लचकता में वृद्धि होती है और सदैव बनी रहती है।
प्राणायाम
इसके द्वारा श्वास-प्रश्वास को नियंत्रित किया जाता है ताकि शरीर की प्रत्येक कोशिका को पर्याप्त प्राणवायु और पौष्टिक तत्त्व प्राप्त हो सके। इसका अभ्यास किया जाए, तो स्वायत्त तंत्रिका तंत्र पर नियंत्रण प्राप्त हो जाता है।
प्रत्याहार
इन्द्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर शरीर के भीतर घटित हो रही घटनाओं पर केन्द्रित करना ।
धारणा
धारणा का अर्थ है चित्त को किसी एक विषय पर स्थिर करना ।
ध्यान
जब धारणा (तल्लीनता) सध जाती है, तो वह ध्यान बन जाती है।
समाधि
ध्यान जब सध जाता है, तो वह समाधि बन जाता है। इसके द्वारा शरीर में व्याप्त चेतना शक्ति या आत्मा के दर्शन हो सकते हैं। अष्टांग योग एक बहुत बड़ा विषय है, परन्तु प्रारंभिक रूप से जानकारी होना ज्ञान की दृष्टि से उचित है।

0 Comments